Adhunik Kavya : Khand 2

Start Date
21/08/2018

End Date
04/12/2018

Enrollment End Date
20/10/2018

No. of
Enrollments
361 students

No course
syllabus uploaded

Created by

Deo Shankar Navin
Jawaharlal Nehru University
5
out of 5
Based on 1 rating
5 star 1
4 star 0
3 star 0
2 star 0
1 star 0
Course Language
Hindi
Course Type
Scheduled
Video transcripts
Course Category
Humanities
Learning Path
Post graduate
Course Length
40 Hours
Weekly time commitments
3 Hours
Course Completion
Yes, after passing all tests. View Certificate
Exam Date
10/12/2018
Credits
4

234

Tutorials

0

Test

0

Assignment

0

Article

0

Weekly Reading list

Overview

हिन्दी के प्रमुख प्रश्नपत्र आधुनिक कविता खण्ड 2 भारत के लगभग सभी विश्वविद्यालयों में जहाँ स्नातकोत्तर हिन्दी पढ़ाई जाती है, शामिल रहता है। इस प्रश्नपत्र के लिए कुल 4 क्रेडिट निर्धारित किया गया है।

आधुनिक हिन्‍दी साहित्य की शुरुआत सामान्‍यतया भारतेन्‍दु युग से ही मानी जाती है। इसी दौर में हिन्‍दी-कविता ब्रजभाषा से खड़ीबोली की ओर बढ़ी और कई श्रेष्‍ठ रचनाकारों के प्रयास से हिन्‍दी साहित्य समृद्ध हुआ। सन् 1900 के बाद दो दशकों के काव्‍य-सृजन पर आचार्य महावीर प्रसाद द्वि‍वेदी के आधुनि‍क सोच के प्रयासों का गहन प्रभाव पड़ा। मैथिलीशरण गुप्त, श्रीधर पाठक, राम नरेश त्रिपाठी आदि‍ इस दौर के वि‍शि‍ष्‍ट कवि‍ माने गए। सन् 1920 के आसपास हिन्‍दी में यूरोप के रोमांटिसिज़्म के प्रभाव में स्वछन्‍द कल्पना की प्रथा बढ़ी। भाव, छन्‍द, अलंकार की दृष्‍टि‍ से कवि‍ताओं में नयापन आया। राजनीतिक स्वच्‍छन्‍दता के मद्देनजर इस दौर की कविता को छायावादी कवि‍ता कहा गया। जयशंकर प्रसाद, सूर्यकान्‍त त्रि‍पाठी निराला, सुमित्रानन्‍दन पन्‍त, महादेवी वर्मा इस युग के पथदर्शी कवि हुए। सन् 1930 आते-आते छायावादी काव्य की बौद्धि‍कता त्‍यागकर कवि‍ता में जन-जन की वाणी मुखरि‍त करने की धारणा पनपी। दुनि‍या भर में समाजवादी विचारधारा तेजी से फैलने लगी। राष्ट्रवादी, गाँधीवादी, विप्लववादी, प्रगतिवादी, यथार्थवादी, हालावादी काव्‍यधाराएँ सामने आईं। सन् 1936 में भारत में प्रगतिशील लेखक संघ की स्‍थापना और हिन्दी साहित्य में मार्क्सवादी दृष्‍टि से साहि‍त्‍य-सृजन एवं साहि‍त्‍यालोचन को इस आलोक में देखा जा सकता है। मार्क्सवादी आलोचकों द्वारा वर्ग-संघर्ष की दॄष्टि से हिन्दी साहित्य के पुनर्मूल्यांकन की पद्धति‍ में भी इस धारण के सूत्र दि‍खते हैं। सन् 1943 में हीरानन्‍द सच्‍चि‍दानन्‍द वात्‍स्‍यायन अज्ञेय के सम्‍पादन में प्रकाशि‍त सात कवि‍यों की कवि‍ताओं के संकलन तार सप्तक द्वारा प्रयोगवाद की घोषणा हुई। प्रयोगवादी कवि‍ता ही बाद में हि‍न्‍दी की नई कवि‍ता के रूप में स्‍वीकृत हुई।

कालान्‍तर में सन् 1960 के बाद की कविता, समकालीन कवि‍ता के रूप में प्रति‍ष्‍ठि‍त हुई, जि‍समें पूर्ववर्ती समस्‍त काव्‍य-धाराएँ समाहि‍त होने लगीं। भारतीय लोकतन्‍त्र की सामाजि‍क परिस्थितियों से उद्वेलि‍त समकालीन हिन्दी कविता के रचनाकारों ने पूर्व-स्थापित प्रयोगवाद और नई कविता के व्यक्तिवाद, तथा अकविता के नकारवाद से विमुख होकर जो नई रचना पद्धति अपनाई, उससे एक बार फि‍र से जनोन्मुखी काव्य का दौर शुरू हुआ। समकालीन युग-यथार्थ के अनुभवों के साथ तैयार हुई समकालीन कविता के दौर में कई धारा के कवि‍ शामि‍ल हुए। इनमें वे भी हैं जो सप्तकों से बाहर रहकर सन् साठ से पूर्व से ही हिन्दी कविता की जमीन मजबूत करते रहे, और वे भी जो सप्तक परम्परा से आने के बावजूद निरन्तर अपनी समझ विकसित और जनसंवेदी करते गए, समय के बदलते स्वरूप के साथ-साथ काव्य सम्बन्धी अपनी धारणाओं, मान्यताओं को साफ करते रहे।

जाहि‍र है कि आधुनि‍क हि‍न्‍दी काव्‍य के इस वि‍राट फलक का सम्‍पूर्ण समावेश इस एक पत्र में सम्‍भव नहीं होता; अतः आधुनिक कविता को दो खण्डों में विभक्त कर पढ़ना-पढ़ाना उचित जान पड़ता है। 

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